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माँ लक्ष्मी

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा

प्रस्तावना

वैभव लक्ष्मी व्रत हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी की कृपा पाने का एक अत्यंत फलदायी व्रत है। यह व्रत विशेष रूप से सुख, समृद्धि और खोए हुए वैभव की पुनः प्राप्ति के लिए किया जाता है। भक्त इसे 11 या 21 शुक्रवारों तक श्रद्धापूर्वक रखते हैं। इस व्रत की कथा सुनने मात्र से घर में मां लक्ष्मी का वास होता है और दरिद्रता दूर होती है।

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शीला का धार्मिक जीवन

एक समय की बात है, एक नगर में शीला नाम की एक धार्मिक और परोपकारी स्त्री रहती थी। उसका स्वभाव बहुत ही शांत और मिलनसार था, और वह सदैव भगवान की भक्ति में लीन रहती थी। उसका पति भी पहले बहुत अच्छा था, लेकिन बाद में बुरी संगति में पड़कर अपना सब कुछ जुए में हार गया। इससे घर में घोर दरिद्रता छा गई और परिवार का सुख-चैन छिन गया। शीला ने कठिन परिस्थितियों में भी अपना धैर्य नहीं खोया और मां लक्ष्मी पर अपना विश्वास बनाए रखा।

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बुढ़िया के रूप में लक्ष्मी का आगमन

एक दिन शीला के घर के द्वार पर एक वृद्ध महिला आई, जिनके चेहरे पर अलौकिक तेज था। शीला ने आदरपूर्वक उन्हें घर के अंदर बुलाया और अपनी सारी व्यथा सुनाई। वह वृद्धा वास्तव में साक्षात मां लक्ष्मी का ही रूप थीं जो शीला की परीक्षा लेने और उसका उद्धार करने आई थीं। उन्होंने शीला को सांत्वना दी और वैभव लक्ष्मी व्रत की महिमा के बारे में बताया। शीला ने बड़ी उत्सुकता से व्रत की विधि और नियमों के बारे में पूछा।

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वैभव लक्ष्मी व्रत की विधि

मां लक्ष्मी ने शीला को बताया कि यह व्रत शुक्रवार को पूरी श्रद्धा और पवित्रता के साथ करना चाहिए। व्रत के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और 'श्री वैभव लक्ष्मी' यंत्र की स्थापना करें। सोने या चांदी का कोई आभूषण या सिक्का रखकर उसकी कुमकुम और अक्षत से पूजा करें। शाम के समय खीर का भोग लगाएं और श्रद्धापूर्वक आरती करें। व्रत के समापन पर कन्याओं को भोजन कराकर उन्हें सुहाग की सामग्री भेंट करनी चाहिए।

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शीला का संकल्प और फल

शीला ने उस वृद्धा की बातों को गाँठ बाँध लिया और अगले शुक्रवार से ही वैभव लक्ष्मी व्रत का संकल्प लिया। उसने 21 शुक्रवारों तक पूरी निष्ठा और नियमों के साथ मां लक्ष्मी की आराधना की। जैसे-जैसे व्रत पूरे होते गए, उसके पति की बुद्धि सुधरने लगी और उसने गलत रास्ते छोड़ दिए। उसका खोया हुआ व्यापार फिर से चलने लगा और घर में धन-धान्य की वर्षा होने लगी। शीला का पूरा परिवार फिर से सुखी और संपन्न हो गया।

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व्रत का उद्यापन

अंतिम शुक्रवार को शीला ने विधि-विधान से व्रत का उद्यापन किया और सात सुहागिन महिलाओं को भोजन कराया। उसने उन्हें वैभव लक्ष्मी व्रत की पुस्तकें भेंट कीं ताकि वे भी मां की कृपा प्राप्त कर सकें। मां लक्ष्मी शीला की भक्ति से प्रसन्न हुईं और उन्होंने साक्षात दर्शन देकर उसे अखंड सौभाग्य का वरदान दिया। तब से यह व्रत लोक में प्रसिद्ध हो गया और लोग अपनी मनोकामना पूर्ति के लिए इसे करने लगे।

शिक्षा

इस कथा का मुख्य संदेश यह है कि सच्ची श्रद्धा और धैर्य के साथ की गई भक्ति कभी निष्फल नहीं होती। मनुष्य को विपत्ति के समय भी अपना धर्म नहीं छोड़ना चाहिए और मां लक्ष्मी पर पूर्ण विश्वास रखना चाहिए।

फल

वैभव लक्ष्मी व्रत की कथा पढ़ने या सुनने से जीवन के सभी आर्थिक कष्ट दूर हो जाते हैं। यह व्रत घर में शांति, समृद्धि और खुशहाली लाता है और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करता है।

जय-जयकार
जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता, तुमको निसदिन सेवत, हर विष्णु विधाता।
आस्ट्रो कलश

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