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श्री विष्णु

श्री सत्यनारायण कथा

प्रस्तावना

भगवान सत्यनारायण की कथा हिंदू धर्म में अत्यंत मंगलकारी और फलदायी मानी जाती है। यह कथा भगवान विष्णु के सत्य स्वरूप को समर्पित है और किसी भी शुभ कार्य या पूर्णिमा के दिन सुनी जाती है। इसे श्रद्धापूर्वक करने से घर में सुख, शांति और समृद्धि का वास होता है और सभी कष्टों का निवारण होता है। यह व्रत कलयुग में मनुष्यों के कल्याण का सबसे सरल साधन बताया गया है।

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प्रथम अध्याय: कथा का प्रारंभ

एक बार नैमिषारण्य तीर्थ में शौनकादि ऋषियों ने सूत जी से पूछा कि कलयुग में मनुष्यों के दुखों का नाश कैसे हो सकता है। सूत जी ने बताया कि भगवान विष्णु ने नारद मुनि को स्वयं इस व्रत के बारे में विस्तार से समझाया था। नारद जी ने जब मृत्युलोक के मनुष्यों को दुखी देखा, तो वे दुखी होकर वैकुंठ गए और भगवान से उपाय पूछा। भगवान विष्णु ने कहा कि सत्यनारायण का व्रत करने से सभी कष्टों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है। यह व्रत किसी भी मनुष्य द्वारा श्रद्धापूर्वक किया जा सकता है।

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द्वितीय अध्याय: निर्धन ब्राह्मण की कथा

काशी नगर में एक अत्यंत निर्धन ब्राह्मण रहता था जो भिक्षा मांगकर अपना जीवन व्यतीत करता था। भगवान विष्णु ने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण कर उसे सत्यनारायण व्रत करने की सलाह दी। ब्राह्मण ने पूर्ण निष्ठा के साथ व्रत का संकल्प लिया और उसी दिन उसे भिक्षा में अत्यधिक धन प्राप्त हुआ। उसने विधि-विधान से पूजा की और शीघ्र ही वह धनवान और सुखी हो गया। उस ब्राह्मण को देखकर एक लकड़हारे ने भी व्रत का महत्व समझा और भक्तिपूर्वक पूजा करके महान सुख प्राप्त किया।

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तृतीय अध्याय: साधु वैश्य की कथा

साधु नाम के एक वैश्य ने राजा उल्कामुख को व्रत करते देख संतान प्राप्ति के लिए इस व्रत का संकल्प लिया। कन्या कलावती के जन्म के बाद वह अपना संकल्प भूल गया, जिसके कारण भगवान रुष्ट हो गए। व्यापार के सिलसिले में जब वह और उसका दामाद रत्नपुर गए, तो उन्हें चोरी के झूठे आरोप में जेल में डाल दिया गया। उनकी पत्नी लीलावती और पुत्री कलावती भी घर पर अत्यंत दरिद्र हो गईं और कष्ट सहने लगीं। अंत में जब उन्होंने पुनः सत्यनारायण की पूजा की, तब भगवान की कृपा से वे कारागार से मुक्त हुए और घर लौटे।

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चतुर्थ अध्याय: प्रसाद का अपमान

साधु वैश्य जब धन लेकर घर लौट रहा था, तब उसने एक सन्यासी रूपी भगवान से झूठ बोला कि उसकी नाव में केवल लता-पत्ते हैं। भगवान ने कहा 'तथास्तु' और उसकी नाव वास्तव में केवल पत्तों से भर गई और भारी हो गई। अपनी भूल स्वीकार कर वैश्य ने क्षमा मांगी और पुनः धन प्राप्त किया, परंतु घर पहुँचने पर उसकी पुत्री कलावती ने प्रसाद ग्रहण किए बिना पति के पास जाने की जल्दी की। इसके कारण उसका पति नाव सहित डूब गया, जिसे देखकर कलावती विलाप करने लगी। जब उसे प्रसाद की याद आई और उसने विधिपूर्वक प्रसाद ग्रहण किया, तब उसका पति सुरक्षित वापस मिल गया।

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पंचम अध्याय: राजा अंगध्वज की कथा

राजा अंगध्वज ने वन में ग्वालों द्वारा की जा रही सत्यनारायण की पूजा का अपमान किया और अहंकारवश प्रसाद ग्रहण नहीं किया। इसके परिणाम स्वरूप राजा के सौ पुत्र मर गए और उसका पूरा राज्य तथा धन-धान्य नष्ट हो गया। राजा को अपनी गलती का आभास हुआ और वह उसी स्थान पर गया जहाँ ग्वाले पूजा कर रहे थे। उसने वहां श्रद्धापूर्वक प्रसाद ग्रहण किया और भगवान से क्षमा मांगी। भगवान की कृपा से राजा को अपना खोया हुआ वैभव और पुत्र पुनः प्राप्त हुए और वह सुखपूर्वक अंत में वैकुंठ गया।

शिक्षा

यह कथा हमें सिखाती है कि सत्य ही ईश्वर है और मनुष्य को कभी भी अपने वचन से पीछे नहीं हटना चाहिए। भगवान की भक्ति में अहंकार और प्रसाद का अपमान पतन का कारण बनता है, जबकि श्रद्धा और भक्ति से असंभव कार्य भी संभव हो जाते हैं।

फल

इस कथा के श्रवण और पठन से दरिद्रता का नाश होता है और पारिवारिक सुख-शांति में वृद्धि होती है। यह भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करने और अंत समय में मोक्ष प्रदान करने वाला महान पुण्यदायी अनुष्ठान है।

जय-जयकार
जय लक्ष्मी रमणा, स्वामी जय लक्ष्मी रमणा, सत्यनारायण स्वामी, जन पातक हरणा।
आस्ट्रो कलश

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