हनुमान जन्म कथा
हनुमान जयंती के पावन अवसर पर अंजनी पुत्र हनुमान की जन्म कथा का श्रवण अत्यंत फलदायी माना जाता है। भगवान शिव के ग्यारहवें रुद्रावतार के रूप में जन्में हनुमान जी साहस, शक्ति और निस्वार्थ भक्ति के सर्वोच्च प्रतीक हैं। यह कथा हमें बताती है कि कैसे एक दिव्य संकल्प और कठिन तपस्या के फलस्वरूप महाबली संकटमोचन का पृथ्वी पर प्राकट्य हुआ। आइए, पूरी श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ पवनपुत्र की इस पावन कथा का स्मरण करें।
माता अंजनी की घोर तपस्या
प्राचीन काल में माता अंजनी और वानर राज केसरी संतान प्राप्ति की तीव्र अभिलाषा रखते थे। माता अंजनी ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए मतंग पर्वत पर घोर तपस्या प्रारंभ की। उन्होंने हजारों वर्षों तक निराहार रहकर और वायु का सेवन करते हुए महादेव की अनन्य आराधना की। उनकी अटूट भक्ति और कठोर नियम देख भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए। महादेव ने उन्हें साक्षात दर्शन दिए और वरदान दिया कि वे स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवतार लेंगे।
दिव्य खीर और आकाशवाणी
उसी कालखंड में अयोध्या के राजा दशरथ पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रकामेष्टि यज्ञ संपन्न कर रहे थे। यज्ञ कुंड से प्रकट हुए अग्नि देव ने राजा दशरथ को एक पात्र में दिव्य खीर प्रदान की। राजा ने वह खीर अपनी रानियों में बाँट दी, तभी एक चमत्कारिक घटना घटी। देव योग से एक चील ने उस खीर का एक छोटा सा भाग अपनी चोंच में दबा लिया और उड़ गई। वह चील उड़ते हुए उसी स्थान के ऊपर से गुजरी जहाँ माता अंजनी तपस्या में लीन थीं।
पवन देव का आगमन
जब वह चील माता अंजनी के ऊपर से जा रही थी, तब पवन देव की प्रेरणा से खीर का वह अंश माता की अंजलि में गिर गया। माता अंजनी ने इसे भगवान शिव का साक्षात प्रसाद समझकर भक्तिपूर्वक ग्रहण कर लिया। इस दिव्य प्रसाद और शिव के अंश के मिलन से माता अंजनी गर्भवती हुईं। चूंकि पवन देव ने उस अंश को माता तक पहुँचाने में मुख्य भूमिका निभाई थी, इसलिए हनुमान जी को 'पवनपुत्र' के नाम से भी जाना जाता है। अंततः चैत्र मास की पूर्णिमा को केसरी नंदन का जन्म हुआ।
बाल हनुमान और सूर्य देव
जन्म के तुरंत पश्चात बाल हनुमान को अत्यंत तीव्र भूख लगी और उन्होंने आकाश में चमकते सूर्य को एक लाल फल समझ लिया। वे अपनी असीम शक्ति से पवन की गति से उड़कर सूर्य को निगलने के लिए आकाश की ओर चल पड़े। मार्ग में उन्होंने राहु को भी परास्त कर दिया और सूर्य देव को अपने मुख में दबा लिया। इससे पूरे ब्रह्मांड में अंधकार छा गया और सभी देवता भयभीत हो उठे। इंद्र ने क्रोध में आकर उन पर वज्र का प्रहार किया जिससे हनुमान जी मूर्छित होकर गिर पड़े।
देवताओं के वरदान और अजेय शक्ति
पवन देव अपने पुत्र की मूर्छा देख अत्यंत क्रोधित हुए और उन्होंने पूरे संसार की प्राणवायु रोक दी। सृष्टि पर आए संकट को देख ब्रह्मा जी और सभी देवताओं ने हनुमान जी को पुनर्जीवित किया और उन्हें अद्भुत वरदान दिए। इंद्र ने उन्हें वज्र से अभेद्य होने का वरदान दिया और ब्रह्मा जी ने उन्हें अमरता प्रदान की। सभी देवताओं की शक्तियों के समाहित होने से वे अजेय और सर्वशक्तिशाली संकटमोचन बने। इस प्रकार वे प्रभु श्री राम के परम भक्त के रूप में लोक कल्याण के लिए अवतरित हुए।
हनुमान जन्म कथा हमें यह सिखाती है कि सच्ची भक्ति और धैर्य से ईश्वर का सानिध्य प्राप्त किया जा सकता है। यह कथा हमें याद दिलाती है कि शक्ति का उपयोग सदैव धर्म और लोक कल्याण के लिए ही करना चाहिए।
हनुमान जयंती पर इस कथा को पढ़ने या सुनने से मनुष्य के सभी भय, रोग और शोक नष्ट हो जाते हैं। यह कथा साधक में आत्मविश्वास का संचार करती है और जीवन के हर संकट से रक्षा करने में सहायक सिद्ध होती है।