गणेश चतुर्थी कथा
श्री गणेश चतुर्थी का व्रत हिंदू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भगवान गणेश के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन व्रत रखने और कथा सुनने से जीवन के सभी संकट दूर हो जाते हैं। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है जो अपने भक्तों के सभी दुखों का नाश करते हैं।
गणेश जी का जन्म
पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर के मैल से एक बालक की मूर्ति बनाई और उसमें प्राण फूँक दिए। उन्होंने बालक को द्वार पर बैठाकर आदेश दिया कि जब तक वह स्नान करें, किसी को भीतर न आने दें। बालक गणेश पूरी निष्ठा के साथ द्वार पर पहरा देने लगे। कुछ ही देर बाद वहां भगवान शिव आए और अंदर जाने का प्रयास किया। बालक ने माता की आज्ञा का पालन करते हुए महादेव को अंदर जाने से रोक दिया।
शिव-पुत्र युद्ध
बालक द्वारा रोके जाने पर भगवान शिव को अत्यंत क्रोध आया और उन्होंने इसे अपना अपमान समझा। शिवजी के गणों और बालक के बीच भीषण युद्ध हुआ लेकिन कोई भी उसे परास्त नहीं कर सका। अंततः क्रोध के वशीभूत होकर भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से बालक का सिर काट दिया। जब माता पार्वती को इस घटना का पता चला, तो वे विलाप करने लगीं और सृष्टि के विनाश पर उतारू हो गईं। उन्होंने अपनी शक्ति से देवताओं को भयभीत कर दिया और बालक को जीवित करने की मांग की।
गजानन रूप की प्राप्ति
पार्वती जी को शांत करने के लिए भगवान शिव ने देवताओं को उत्तर दिशा में जाकर सबसे पहले मिलने वाले प्राणी का सिर लाने का आदेश दिया। देवताओं को एक हथिनी का बच्चा मिला और वे उसका मस्तक लेकर आए। शिवजी ने उस गज-मस्तक को बालक के धड़ से जोड़कर उसे पुनः जीवित कर दिया। इस प्रकार गणेश जी का नाम गजानन पड़ा और वे देवताओं में सबसे पहले पूजे जाने लगे। माता पार्वती अपने पुत्र को जीवित पाकर अत्यंत प्रसन्न हुईं और समस्त देवताओं ने गणेश जी को आशीर्वाद दिया।
चंद्रमा का अभिमान भंग
एक बार गणेश जी को देखकर चंद्रमा ने उनके रूप का उपहास किया और उन पर हंसने लगे। चंद्रमा को अपने रूप पर बहुत गर्व था, जिसे देखकर गणेश जी ने उन्हें श्राप दे दिया। उन्होंने कहा कि आज के दिन यानी भाद्रपद चतुर्थी को जो भी चंद्रमा को देखेगा, उस पर झूठा आरोप लगेगा। चंद्रमा को अपनी भूल का आभास हुआ और उन्होंने गणेश जी से क्षमा मांगी। तब गणेश जी ने कहा कि इस कथा के श्रवण से ही दर्शन के दोष का निवारण हो सकेगा।
यह कथा हमें सिखाती है कि अहंकार पतन का कारण होता है और हमें अपनी शक्तियों पर घमंड नहीं करना चाहिए। माता-पिता की सेवा और उनकी आज्ञा का पालन करना ही सबसे बड़ा धर्म है।
इस कथा को सुनने से भक्तों के जीवन के सभी विघ्न और बाधाएं पूर्णतः समाप्त हो जाती हैं। यह व्रत और कथा सुख, शांति और समृद्धि प्रदान करने वाली तथा मनोकामनाएं पूर्ण करने वाली मानी जाती है।