मकर संक्रांति
मकर संक्रांति सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का प्रतीक है, जो उत्तरायण काल की शुरुआत और अंधकार से प्रकाश की ओर गमन को दर्शाता है। यह पर्व दान, तप और पवित्र स्नान के माध्यम से आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने और नई फसल के आगमन का उत्सव है।
पौराणिक कथा के अनुसार, इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि देव के घर मिलने जाते हैं, जो उनके बीच के मतभेदों के अंत और पारिवारिक प्रेम का प्रतीक है। महाभारत काल में भीष्म पितामह ने भी अपनी देह त्यागने के लिए इसी शुभ उत्तरायण काल की प्रतीक्षा की थी ताकि उन्हें मोक्ष प्राप्त हो सके।
- 1ब्रह्म मुहूर्त में पवित्र नदी या जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें।
- 2तांबे के पात्र में जल, लाल चंदन, अक्षत और पुष्प डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।
- 3सूर्य देव की प्रतिमा के समक्ष धूप-दीप प्रज्वलित कर पूजन करें।
- 4आदित्य हृदय स्तोत्र या सूर्य चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
- 5भगवान को तिल और गुड़ से निर्मित नैवेद्य अर्पित करें।
- 6पूजा के पश्चात खिचड़ी, तिल और गर्म वस्त्रों का सामर्थ्यानुसार दान करें।
- 1स्नान से पूर्व कुछ भी ग्रहण न करें और सात्विक आहार का पालन करें।
- 2दिन भर तामसिक भोजन, मांस-मदिरा और क्रोध से पूरी तरह दूर रहें।
- 3सूर्योदय के समय सूर्य देव की उपासना और मंत्र जप को प्राथमिकता दें।
- 4निर्धन व्यक्तियों को दान देते समय मन में विनम्रता और सेवा भाव रखें।
इस दिन मुख्य रूप से तिल और गुड़ के लड्डू, गज्जक तथा दाल-चावल की खिचड़ी का भोग लगाया जाता है।
ॐ घृणि सूर्याय नमः - प्रकाश और ऊर्जा के स्वामी भगवान सूर्य को मेरा सादर नमन है।
सूर्य की आराधना से आरोग्य, तेज और आत्मविश्वास में वृद्धि होती है। इस दिन किए गए दान और पुण्य कर्मों से संचित पापों का नाश होता है और आध्यात्मिक उन्नति के साथ मोक्ष की प्राप्ति होती है।