कृष्ण जन्माष्टमी
कृष्ण जन्माष्टमी भगवान विष्णु के आठवें अवतार, श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का प्रतीक है। यह पर्व अधर्म पर धर्म की विजय और प्रेम व भक्ति के दिव्य संदेश को प्रवाहित करता है।
द्वापर युग में मथुरा के राजा कंस के अत्याचारों को समाप्त करने के लिए भगवान विष्णु ने देवकी और वसुदेव के आठवें पुत्र के रूप में जन्म लिया। कारागार में आधी रात को प्रकट होकर उन्होंने अलौकिक लीला रची और गोकुल के नंद बाबा के घर सुरक्षित पहुँच गए। इसी पावन दिवस को जन्माष्टमी के रूप में मनाया जाता है।
- 1मध्यरात्रि में बाल कृष्ण की मूर्ति का गंगाजल और पंचामृत से अभिषेक करें।
- 2प्रभु को नए पीले वस्त्र, मुकुट, वैजयंती माला और बांसुरी से सुशोभित करें।
- 3चंदन का तिलक लगाएं और सुगंधित पुष्प व तुलसी दल अर्पित करें।
- 4धूप-दीप दिखाकर ॐ नमो भगवते वासुदेवाय का जाप करें।
- 5आरती करें और झूला झुलाकर कृष्ण जन्मोत्सव की खुशियां मनाएं।
- 1व्रत के दिन ब्रह्मचर्य का पालन करें और सात्विक विचार रखें।
- 2आधी रात को भगवान के जन्म के बाद ही फलाहार या व्रत का पारण करें।
- 3पूरे दिन अन्न का त्याग करें, केवल फल और दूध का सेवन कर सकते हैं।
भगवान को धनिया की पंजीरी, माखन-मिश्री और पंचामृत का मुख्य भोग लगाया जाता है। साथ ही ५६ भोग अर्पित करने की भी परंपरा है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय - इस मंत्र का अर्थ है कि मैं उस वासुदेव पुत्र कृष्ण को नमन करता हूँ जो सर्वव्यापी और दिव्य हैं।
इस व्रत और पूजन से मानसिक शांति, सुख-समृद्धि और संतान सुख की प्राप्ति होती है। भक्त को भक्तिमय जीवन और अंततः मोक्ष की प्राप्ति होती है।