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गुरु पूर्णिमा

महत्व

गुरु पूर्णिमा गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का महापर्व है। यह दिन अज्ञान के अंधकार को मिटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले गुरु की पूजा को समर्पित है। आध्यात्मिक उन्नति और ज्ञान प्राप्ति के लिए गुरु का आशीर्वाद अनिवार्य माना गया है।

कथा

पौराणिक मान्यता के अनुसार आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था, जिन्होंने वेदों का वर्गीकरण किया और महाभारत जैसे महाकाव्य की रचना की। उन्हें आदिगुरु माना जाता है, इसलिए इस दिन को व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं। व्यास जी ने इसी दिन शिष्यों को वेदों का दिव्य ज्ञान प्रदान करना आरंभ किया था।

पूजा विधि
  1. 1प्रातः काल स्नान के पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर व्रत का संकल्प लें।
  2. 2पूजा स्थल पर महर्षि व्यास और अपने गुरु की प्रतिमा स्थापित करें।
  3. 3गुरु के चरणों को धोकर तिलक लगाएं और पुष्प, गंध व अक्षत अर्पित करें।
  4. 4गुरु को वस्त्र, फल और दक्षिणा भेंट कर उनके सम्मुख नतमस्तक हों।
  5. 5गुरु चालीसा या गुरु गीता का श्रद्धापूर्वक पाठ करें।
  6. 6घी का दीपक जलाकर गुरु की आरती करें और आशीर्वाद प्राप्त करें।
व्रत नियम
  1. 1दिन भर सात्विक विचार रखें और क्रोध व निंदा से बचें।
  2. 2तामसिक भोजन जैसे लहसुन-प्याज और मांसाहार का पूर्ण त्याग करें।
  3. 3गुरु द्वारा प्रदत्त मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करें।
  4. 4भोजन में केवल एक बार फलाहार या सात्विक आहार ग्रहण करें।
प्रसाद

गुरु पूर्णिमा पर मुख्य रूप से हलवा, पंचामृत और मौसमी फलों का भोग लगाया जाता है। चने की दाल और मीठी पूरी का प्रसाद अर्पित करना भी अत्यंत शुभ होता है।

मंत्र

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ अर्थ: गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और साक्षात् शिव हैं; वे ही परब्रह्म हैं, उन श्री गुरु को मेरा नमस्कार है।

लाभ

इस व्रत के पालन से साधक को मानसिक शांति, बुद्धि और विद्या की प्राप्ति होती है। गुरु की कृपा से जीवन के समस्त संकट दूर होते हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।

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