गोवर्धन पूजा
गोवर्धन पूजा प्रकृति की शक्ति और भगवान कृष्ण के प्रति पूर्ण समर्पण का उत्सव है। यह पर्व मानव जीवन में गौवंश, कृषि और पर्यावरण के महत्व को रेखांकित करते हुए कृतज्ञता व्यक्त करने का संदेश देता है।
इंद्र के अहंकार को चूर करने हेतु भगवान कृष्ण ने ब्रजवासियों को गोवर्धन पर्वत की पूजा करने के लिए प्रेरित किया। क्रोधित होकर इंद्र ने भारी वर्षा की, तब कृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठाकर सात दिनों तक ब्रज की रक्षा की। अंततः इंद्र ने अपनी भूल स्वीकार की और कृष्ण की शरण में आए।
- 1आंगन में गोबर से गोवर्धन पर्वत और भगवान की आकृति बनाएं।
- 2पर्वत को फूलों, कलावा और दीपकों से विधिवत सजाएं।
- 3धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित कर भगवान कृष्ण का आवाहन करें।
- 4गाय और बछड़ों को स्नान कराकर उनका तिलक और पूजन करें।
- 5गोवर्धन पर्वत की सात परिक्रमाएं करें और जयकारे लगाएं।
- 6अन्नकूट का भोग लगाकर सामूहिक आरती संपन्न करें।
- 1पूरे दिन सात्विक आहार लें और मांस-मदिरा से दूर रहें।
- 2किसी भी जीव विशेषकर गाय को नुकसान न पहुंचाएं।
- 3दिन में सोने से बचें और निरंतर कृष्ण नाम का जाप करें।
- 4क्रोध और अपशब्दों का त्याग कर मन को शांत रखें।
इस दिन 'अन्नकूट' का विशेष प्रसाद चढ़ाया जाता है जिसमें विभिन्न प्रकार की सब्जियां, अनाज और छप्पन भोग शामिल होते हैं। इसे भगवान को अर्पित करने के बाद सभी भक्तों में बांटा जाता है।
नमस्ते गिरिराजाय गोवर्धनधराय च। कौस्तुभमणिमालाय कृष्णाय परमात्मने॥ अर्थ: गोवर्धन को धारण करने वाले, कौस्तुभ मणि पहनने वाले परमात्मा श्री कृष्ण को नमस्कार है।
इस पूजा से घर में सुख-समृद्धि, धन और धान्य की कभी कमी नहीं होती। यह भक्तों के अहंकार का नाश कर उन्हें भगवान का संरक्षण और मानसिक शांति प्रदान करती है।