गीता जयंती
गीता जयंती वह पवित्र दिन है जब भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्ध मैदान में अर्जुन को श्रीमद्भगवद्गीता का दिव्य उपदेश दिया था। यह पर्व मनुष्य को अज्ञान के अंधकार से निकालकर सत्य, कर्म और धर्म के मार्ग पर चलने की शाश्वत प्रेरणा देता है।
महाभारत युद्ध के आरंभ में जब अर्जुन मोहवश अपने ही गुरुजनों और संबंधियों पर शस्त्र उठाने से विचलित हो गए, तब भगवान कृष्ण ने उन्हें गीता का ज्ञान दिया। मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी (मोक्षदा एकादशी) के दिन यह पावन संवाद हुआ था। इस उपदेश ने अर्जुन के संशय को समाप्त कर उन्हें धर्म की रक्षा के लिए युद्ध हेतु तैयार किया।
- 1भगवान कृष्ण और श्रीमद्भगवद्गीता ग्रंथ की प्रतिमा स्थापित करें
- 2दीप प्रज्वलित कर पूजन का संकल्प लें
- 3गीता पुस्तक का गंगाजल से अभिषेक और पुष्प-अक्षत अर्पित करें
- 4संपूर्ण गीता या कम से कम 11वें अध्याय का पाठ करें
- 5भगवान कृष्ण की आरती करें और श्रद्धापूर्वक प्रणाम करें
- 6धार्मिक पुस्तकों और अन्न का दान करें
- 1अन्न का पूर्ण त्याग कर फलाहार ग्रहण करें
- 2तामसिक भोजन, प्याज और लहसुन का सेवन न करें
- 3दिनभर क्रोध और निंदा से दूर रहकर मौन या सत्संग करें
- 4रात में जागरण कर कृष्ण नाम का संकीर्तन करें
भगवान को माखन-मिश्री, फल और धनिया की पंजिरी का भोग लगाया जाता है। प्रसाद में तुलसी दल का होना अनिवार्य माना जाता है।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय - मैं सर्वव्यापी भगवान वासुदेव (कृष्ण) को अत्यंत श्रद्धा के साथ नमस्कार करता हूँ।
गीता के पठन और मनन से मानसिक शांति, एकाग्रता और आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। यह जीवन के कठिन समय में सही निर्णय लेने की शक्ति प्रदान करता है और अंततः मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।