गणेश चतुर्थी
गणेश चतुर्थी भगवान गणेश के जन्मोत्सव का प्रतीक है, जो बुद्धि, समृद्धि और सौभाग्य के अधिष्ठाता देव हैं। यह पर्व नई शुरुआत और जीवन की समस्त बाधाओं को दूर करने की आध्यात्मिक शक्ति का उत्सव है।
पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन से एक बालक का निर्माण कर उसमें प्राण फूँके थे। जब उस बालक ने भगवान शिव को भवन में प्रवेश से रोका, तो महादेव ने क्रोधवश उसका सिर काट दिया। पार्वती जी को दुखी देख शिव जी ने बालक के धड़ पर हाथी का मुख लगाकर उसे पुनर्जीवित किया, जो कालांतर में 'गजानन' कहलाए।
- 1गणेश प्रतिमा की चौकी पर स्थापना और 'प्राण प्रतिष्ठा' करना।
- 2षोडशोपचार विधि से दीप, धूप और पुष्प अर्पित करना।
- 3भगवान को 21 दूर्वा घास की कोमल पत्तियां चढ़ाना।
- 4सिंदूर का तिलक लगाकर अक्षत और जनेऊ अर्पित करना।
- 5मोदक का भोग लगाकर अंत में कपूर से आरती करना।
- 1पूरे दिन मन और कर्म से सात्विकता बनाए रखें।
- 2चतुर्थी की रात को चंद्रमा के दर्शन करने से बचें ताकि मिथ्या कलंक न लगे।
- 3व्रत के दौरान केवल फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करें।
- 4पूरे दिन 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का मानसिक जाप करें।
गणेश जी को 21 मोदकों का भोग लगाना सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसके अतिरिक्त उन्हें मोतीचूर के लड्डू और पंचामृत का नैवेद्य भी अत्यंत प्रिय है।
वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ (अर्थ: हे विशाल शरीर वाले और करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव, मेरे सभी कार्यों को सदा बाधा रहित पूर्ण करें।)
इस व्रत और पूजन से भक्त के जीवन से समस्त विघ्न-बाधाओं का नाश होता है। यह उपासक को तीक्ष्ण बुद्धि, अटूट समृद्धि और मानसिक शांति प्रदान कर सफलता के मार्ग खोलता है।