छठ पूजा
छठ पूजा सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का महापर्व है, जो प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और आत्म-शुद्धि का प्रतीक माना जाता है। यह पर्व जीवनदायिनी ऊर्जा के स्रोत सूर्य को धन्यवाद देने और आध्यात्मिक ऊर्जा के संचय हेतु अत्यंत महत्वपूर्ण है।
पौराणिक कथा के अनुसार राजा प्रियव्रत की मृत संतान को देवी षष्ठी ने अपने स्पर्श से पुनर्जीवित कर दिया था, जिसके बाद राजा ने इस व्रत को आरंभ किया। एक अन्य कथा के अनुसार वनवास के दौरान द्रौपदी ने भी खोया हुआ राज्य पुनः प्राप्त करने के लिए भगवान सूर्य की कठिन उपासना की थी।
- 1नहाय-खाय के दिन स्नान कर सात्विक भोजन ग्रहण करना
- 2खरना के दिन दिनभर उपवास रखकर शाम को गुड़ की खीर का सेवन
- 3बांस के सूप में फल और ठेकुआ सजाकर जलाशय की ओर प्रस्थान
- 4अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देकर सुख-समृद्धि की कामना करना
- 5उदयमान सूर्य को अर्घ्य अर्पित कर व्रत का समापन करना
- 1व्रती को 36 घंटों तक निर्जला उपवास का पालन करना अनिवार्य है
- 2पूजा की शुद्धता के लिए जमीन पर सोना आवश्यक है
- 3बिना स्नान किए पूजा की किसी भी सामग्री को स्पर्श करना वर्जित है
- 4भोजन और प्रसाद में प्याज, लहसुन और मांस-मदिरा का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है
छठ का मुख्य प्रसाद शुद्ध घी और गुड़ से बना 'ठेकुआ' है। इसके साथ ही सूप में डाभ नींबू, गन्ना, केला और मौसमी फलों को चढ़ाया जाता है।
ॐ एहि सूर्य सहस्त्रांशों तेजो राशे जगत्पते, अनुकंपय मां भक्त्या गृहाणार्घ्यं दिवाकर॥ (अर्थ: हे हजारों किरणों वाले तेजपुंज सूर्य देव, मुझ पर कृपा करें और मेरा अर्घ्य स्वीकार करें।)
इस व्रत से साधक को मानसिक शांति, उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है। सूर्य की ऊर्जा से चर्म रोगों का नाश होता है और संतान सुख के साथ घर में अटूट समृद्धि आती है।