भाई दूज
भाई दूज भाई-बहन के पवित्र प्रेम और अटूट विश्वास का प्रतीक है। यह कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाता है, जो मृत्यु के देवता यमराज और उनकी बहन यमुना के स्नेहिल मिलन और मानवीय रिश्तों की महत्ता को दर्शाता है।
देवी यमुना ने अपने भाई यमराज को कई बार भोजन पर निमंत्रित किया, अंततः यमराज इस दिन बहन के घर पहुंचे। प्रसन्न होकर यमुना ने यमराज का तिलक कर उन्हें स्वादिष्ट भोजन कराया, जिससे अभिभूत होकर यमराज ने वरदान दिया कि जो भाई इस दिन अपनी बहन से तिलक कराएगा, उसे यमपाश और अकाल मृत्यु का भय नहीं सताएगा।
- 1प्रातःकाल स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनें और पूजा की थाली तैयार करें।
- 2भाई को लकड़ी के चौक पर उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बिठाएं।
- 3भाई के माथे पर रोली, केसर और अक्षत का तिलक लगाएं।
- 4भाई के हाथों में कलावा बांधें और उसे सूखा नारियल (गोला) भेंट करें।
- 5यमराज और यमुना जी का ध्यान करते हुए भाई की आरती उतारें।
- 6भाई को अपने हाथों से बना सात्विक भोजन और मिठाई प्रेमपूर्वक खिलाएं।
- 1बहनें जब तक भाई को तिलक न कर दें, तब तक निर्जला या फलाहार उपवास रखें।
- 2भाई को यथासंभव अपनी बहन के घर ही जाकर भोजन ग्रहण करना चाहिए।
- 3पूजा के समय क्रोध और कटु वचनों का पूर्णतः त्याग करें।
- 4इस दिन यमराज के निमित्त दीपदान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
मुख्य रूप से सूखे मेवे, मखाने की खीर और बेसन के लड्डू का भोग लगाया जाता है। बहन द्वारा तैयार किया गया सात्विक पारंपरिक भोजन ही मुख्य प्रसाद है।
भ्रातस्तवानुजाताहं भुंक्ष्व भक्तमिदं शुभम्। प्रीतये यमराजस्य यमुनाया विशेषतः॥ अर्थ: हे भाई, मैं तुम्हारी बहन हूँ, यमराज और यमुना की प्रसन्नता के लिए आप इस शुभ अन्न को ग्रहण करें।
इस व्रत से भाई को दीर्घायु, आरोग्य और अकाल मृत्यु से सुरक्षा प्राप्त होती है। यह अनुष्ठान भाई-बहन के संबंधों को मजबूत कर जीवन में सुख-समृद्धि और मानसिक शांति प्रदान करता है।