अक्षय तृतीया
वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा जाता है, जिसका अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो। यह दिन आध्यात्मिक और भौतिक समृद्धि के लिए अत्यंत शुभ और स्वयं-सिद्ध मुहूर्त माना जाता है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी दिन भगवान परशुराम का अवतार हुआ था और माँ गंगा का धरती पर अवतरण हुआ था। इसी दिन सुदामा अपने मित्र भगवान श्री कृष्ण से मिलने द्वारका पहुँचे थे, जहाँ उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रभु ने उनकी दरिद्रता का अंत कर उन्हें अक्षय धन प्रदान किया था।
- 1प्रातः काल जल्दी उठकर पवित्र नदी या घर पर गंगाजल युक्त जल से स्नान करें।
- 2पूजा स्थल पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- 3देवताओं को पीले पुष्प, तुलसी दल, अक्षत और चंदन अर्पित करें।
- 4घी का दीपक जलाकर विष्णु सहस्रनाम या लक्ष्मी सूक्त का पाठ करें।
- 5सोने-चांदी के आभूषणों या सिक्कों का पूजन कर आरती संपन्न करें।
- 6अंत में यथाशक्ति दान-पुण्य कर ब्राह्मणों को भोजन कराएं।
- 1दिन भर मन में सात्विक विचार रखें और झूठ या क्रोध से बचें।
- 2उपवास के दौरान केवल फलाहार या सात्विक भोजन ही ग्रहण करें।
- 3इस दिन तामसिक भोजन, लहसुन, प्याज और मांस-मदिरा का पूर्ण त्याग करें।
- 4भूमि पर शयन करना और ब्रह्मचर्य का पालन करना शुभ माना जाता है।
प्रसाद में जौ का सत्तू, ककड़ी, चने की दाल और मिश्री का भोग लगाया जाता है। साथ ही जल से भरे कलश और मौसमी फलों का दान व नैवेद्य अर्पित किया जाता है।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं लक्ष्मी नारायणाय नमः - इस मंत्र का अर्थ है कि हम सौभाग्य की देवी लक्ष्मी और जगत के पालनहार नारायण को नमन करते हैं।
इस दिन किए गए जप, तप और दान से अनंत गुना फल मिलता है और जन्म-जन्मांतर के पाप मिटते हैं। यह व्रत घर में लक्ष्मी का स्थायी वास सुनिश्चित करता है और आर्थिक संकटों से मुक्ति दिलाता है।