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Ganesha

गणेश आरती

आरती
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
एकदंत, दयावंत, चार भुजाधारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूस की सवारी॥
अंधन को आँख देत, कोढ़िन को काया।
बाँझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥
हार चढ़े, फूल चढ़े और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥
जय गणेश, जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥
अर्थ

यह आरती भगवान गणेश की महिमा का गुणगान करती है, जिन्हें विघ्नहर्ता माना जाता है। इसमें उनके दिव्य स्वरूप, जैसे एक दांत और चार भुजाओं का वर्णन है। यह प्रार्थना भक्त के जीवन से बाधाओं को दूर करने और सुख-समृद्धि लाने की याचना करती है। यह हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा से की गई सेवा से सभी सांसारिक कष्ट मिट जाते हैं।

कब गाएँ

गणेश चतुर्थी, किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत में या प्रतिदिन सुबह और शाम की पूजा के दौरान।

लाभ

इस आरती का नियमित पाठ करने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और रिद्धि-सिद्धि की प्राप्ति होती है। यह भक्तों को मानसिक शांति, सुख, सौभाग्य और समृद्धि का आशीर्वाद प्रदान करती है।

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Sanatan Blessing

सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्दुःखभाग् भवेत्॥

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